जहाँ तुम्हें द्वन्द दिखाई पढ़े वहीँ साक्षी साधना | द्वन्द को तुम सूचना मान लेना की साक्षी साधने की घड़ी आ गयी , जहाँ द्वन्द दिखाई पड़े - प्रेम और घृणा -- तुम चुनना मत, दोनों के साक्षी हो जाना | क्रोध और दया -- तो तुम चुनना मत, दोनों के साक्षी हो जाना | स्त्री और पुरुष -- तो तुम चुनना मत, दोनों के साक्षी हो जाना | सम्मान - अपमान -- चुनना मत, दोनों के साक्षी हो जाना | सुख-दुःख -- साक्षी हो जाना | जहाँ तुम्हें द्वन्द दिखाई पड़े, वहीँ साक्षी हो जाना | अगर ये एक स्वर्ण-सूत्र तुमने पाल लिया, तो वीतराग की दशा बहुत दूर नहीं है | बूँद बूँद घड़ा भर जाता है, ऐसे ही बूँद बूँद इस निर्विकल्पता को साधने से तुम्हारी समाधी का घड़ा भरेगा, एक दिन तुम ऊपर से बहने लगोगे | न केवल तुम समाधिस्थित हो जाओगे, तुम्हारे पास जो आएंगे उन्हें भी समाधी की सुवास मिलेगी, वे भी भर उठेंगे किसी अलोकिक आनंद से |
ओशो
अष्टावक्र महागीता
No comments:
Post a Comment